ये मै हूँ

ये मै हूँ
ये हम हैं..

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

मेरी हस्ती...

चहरों के जंगल में कितने क़ाबिल, कितने अलीम
कौन है! जो इस नाफ़हम का पता पूछता है।

आसमां में इक चाँद रोशन, कई सितारों की शम्मे हंसी
गुम्गास्ता एक टूटा तारा अपनी मंज़िल ढूंढता है।

तूफां उड़ा ले आई कहाँ, किस शाख से झरा था मै
तड़प रहा इक सिजदा, मुक़द्दस रौशनी चाहता है।

# अलीम= विद्वान
# नाफ़हम= मुर्ख
# गुम्गास्ता= भटका हुआ
#सिजदा= प्रार्थना
#मुक़द्दस= पवित्र

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

पिलाई थी यारों ने.....

पिलाई थी यारों ने उस दिन क़सम पर

यादों के सागर में जा मिली चुपके से
दो घूँट ज़ाम हलक से उतरकर।

जरूर वो शराब रही थी पुरानी
तभी तो बही वो कब की कहानी
दिल से आँखों का किनारा पकड़कर।

पिलाई थी यारों ने उस दिन क़सम पर

माज़ी की तन्हाइयों में सिसकती
वो दास्तां उस दिन रोई तड़पकर।

क़रार था यारों से जो न पियेंगे ज्यादा
टूटा था छन से मैख़ाने के दर पर।

पिलाई थी यारों ने उस दिन कसम पर

# माज़ी =past

सोमवार, 19 अगस्त 2013

याद आता हूँ न बहना.....

लोरियाँ थी, गोद था
खिलौने थे, आमोद था।
पर अकेला था बचपन
तभी तुम थी आयी,
कलाई पकड़ मेरी
पुकारा था भाई।

विदा होके तुम क्यों हो गई पराई,
याद आता है न बहना तुम्हारा यह भाई।

तुमसे लड़ना-झगड़ना
कभी जोरों की तकरार
पापा की थी लाडली
लगाती शिकायतों का अम्बार।
पर नाज़ुक सा दिल तुम्हारा
जब पड़ती मुझे मार
क्यों आती थी तुम्हे रुलाई।

विदा होके तुम क्यों हो गई पराई,
याद आता है न बहना तुम्हारा यह भाई।

कितना करता मै तुम्हे परेशान
पर मुझमे ही रहती तुम्हारी जान।
सो जाता जब मै थक कर
नित ओढ़ाती तुम चादर।
मुझमे तो न थी
क्यों तुममे थी इतनी ख़ुदाई
तुम इश्वर की रहमत हो
जो मेरे जीवन में आयी।

विदा होके तुम क्यों हो गई पराई,
याद आता है न बहना तुम्हारा यह भाई।

निराशा के बादल जब छाते
पड़ती जब घर पे संकट
घर-संसार में प्राण थी भरती
तुम्हारी चंचल बातें, नादां मुस्कराहट।

पड़ती थी माँ जब बिमार
संभल लेती थी घर-रसोई
मुझसे कहती -न करो चिन्ता
पढो जाकर, मै हूँ न भाई।

विदा होके तुम क्यों हो गई पराई,
याद आता है न बहना तुम्हारा यह भाई।

अजीब सा था मौन क्रंदन
निःशब्द सारे, सूना आँगन।
पाहून संग तुम्हारी , जब हुई थी विदाई।
अब किसे चिढ़ाऊँ, किसे मनाऊं
तुम्हारे स्नेह की कैसे हो भरपाई।

विदा होके तुम क्यों हो गयी पराई
याद आता है न बहना तुम्हारा यह भाई

इस सावन भी डाकिया आया
लिफाफे में नेह का धागा लाया
इस बरस भी, सज जाएगी कलाई
राखी तो आई पर तुम न आयी।

विदा होके तुम क्यों हो गयी पराई
याद आता है न बहना तुम्हारा यह भाई।





















फिर से उनका मिलना....

दो पल क्या मिला उनसे ,ताज़े हो गए ज़ख्म सारे
पर  दर्दे-ए-ज़ख्म की इस टीस पे, कई सुकून कूर्बान।

जंजीरों की जकड़न इधर भी थी, बेड़ियाँ उधर भी
पर रिहा होती उन निगाहों पे ,कई आजादी कुर्बान।

सफ़ेदी बालों में इधर भी थी, झुर्रियां गालों पे उधर भी
पर उम्र की उन फरियादी लकीरों पे, कई जवानी कुर्बान।

कहने को कुछ इधर भी था,दास्तान-ए-उल्फत उधर भी
पर झुकी नज़रों की उस ख़ामोशी पे ,कई फ़साने कुर्बान।

चाहत का भरम इधर भी था, कुछ ख़लिश उधर भी
पर गिला करती उस पहर पे , कई सदियाँ कुर्बान।

जाना उनका कहकर कि "फिर मिलेंगे" बिमल
इन दो लफ़्ज़ों की बख्शीश पे , कई ज़ुदाई कुर्बान।

रविवार, 11 अगस्त 2013

इ.एम.आइ

बिक गए हैं हम,बिक गए हो तुम
 हर महीने की पहली तारीख को
आ जाती हैं किश्तें हमारी।

हाँ उस दिन पिटारी भी आती है वेतन की
पर किश्तों की सुरसा रहती है मुँह फाड़ी।

गाड़ी किश्तों पर,किश्तों पे मकान
किश्तों पे चलती है ऐयाशी सारी।

औकात न थी दो गज ज़मीं की
आसमां की हबस पड़ गई हमें भारी।

हँसी बिक गयी, बिक गए सारे आँसू
ख्वाबों की भी बोली लग गयी हमारी।

संताने भी फल रही है किश्तों की खाद से
इंजीनियर किश्तों पे, किश्तों पे डॉक्टरी

गिरवी हो गया सारा उम्मीदों का जहां
हाय ! ये किश्तें पड़ गयी सपनो पे भारी।

हुए दोस्ती-फ़साने-प्यार ख़स्ते
कौल-क़सम-क़रार सस्ते
क्या करें हम किसे संभाले
किश्तों को या रिश्तों की डोरी।

चले थे क़र्ज़ पे खुशियाँ बटोरने
ख़ुशी कैसी ! कि गई चैनों-अमन भी हमारी।

चलो तैयार हो जाएँ बिकने को
आज पहली तारीख़ है
आ गईं हैं किश्तें हमारी।


शनिवार, 10 अगस्त 2013

रहे न रहे

यादों के धुंध के पार
कोई तो अपना सा है।
ऐ दिल पास तो जा ज़रा
फिर वो कशिश रहे न रहे।।

दूर कौन सा राग घुल रहा
विरह है या कोई ग़ज़ल।
ऐ दिल सुन तो ज़रा
फिर वो धुन रहे न रहे।।

ये कैसी बयार है बह रही
नशा सा है घुल रहा।
ऐ दिल झूम ले ज़रा
ख़ुमार वो फिर रहे न रहे।।

वो अफ़ताब है या चेहरे का नूर
ख़्वाब होंगे रोशन या जायेंगे जल।
ऐ दिल फ़ासला बना ज़रा
ख़ुद पे  इख्तियार रहे न रहे।।


नोट: दूर को कृप्या door पढ़े। सॉफ्टवेयर में प्रोब्लेम के कारण 'द ' पर 'ऊ 'की मात्रा दीखाई नहीं दे रही।

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

नो लाइफ विदाउट वाइफ

बेताब से रहते हैं तेरी याद में अक्सर
रात भर नहीं सोते हैं तेरी याद में अक्सर।
जिस्म में दर्द का बहाना बना के,
हम टूट के रोते हैं तेरी याद में अक्सर।।

बेखयाली में रहते हैं अक्सर
दफ़्तर में देर तक बैठते हैं बेमतलब,
ज्यादा काम की दुहाई देकर।
ज़िन्दगी तो लगने लगी है बस
दफ़्तर से घर की दूरी भर।।

वो खामोश दीवाल घड़ी
जो सिर्फ समय दिखाती थी,
कानों में चीखती है वह अब
सिर्फ टिक-टिक का शोर कर।।

छत पे लटका वो पंखा
बन गया है हमदम-सखा,
घंटो उसे देखते हैं -नींद छोड़कर।
रातें अक्सरहां कटती है करवटों पर
फिर करवटें भी सो जाती हैं दम तोड़कर।।


कोने में रखा हुआ वो फ्रिज
जिसमे कई चीजें तुम रखती थी भर-भर।
अब बस पानी की बोतलें रहती हैं-
कुछ बासी रोटियां या कुछ ब्रेड-बटर।।

याद आता है खिलाना तुम्हारा पूरियां तलकर
वो कढ़ी-राजमा, पनीर वो मखनी, आलू-मटर।
आ जाओ की कढ़ाई-पतीले बग़ावत कर रहे हैं
बंद माइक्रोवेव रोता है अपनी किस्मत पर।।

बेताब से रहते हैं तेरी याद में अक्सर
रात भर नहीं सोते हैं तेरी याद में अक्सर।।