बेताब से रहते हैं तेरी याद में अक्सर
रात भर नहीं सोते हैं तेरी याद में अक्सर।
जिस्म में दर्द का बहाना बना के,
हम टूट के रोते हैं तेरी याद में अक्सर।।
बेखयाली में रहते हैं अक्सर
दफ़्तर में देर तक बैठते हैं बेमतलब,
ज्यादा काम की दुहाई देकर।
ज़िन्दगी तो लगने लगी है बस
दफ़्तर से घर की दूरी भर।।
वो खामोश दीवाल घड़ी
जो सिर्फ समय दिखाती थी,
कानों में चीखती है वह अब
सिर्फ टिक-टिक का शोर कर।।
छत पे लटका वो पंखा
बन गया है हमदम-सखा,
घंटो उसे देखते हैं -नींद छोड़कर।
रातें अक्सरहां कटती है करवटों पर
फिर करवटें भी सो जाती हैं दम तोड़कर।।
कोने में रखा हुआ वो फ्रिज
जिसमे कई चीजें तुम रखती थी भर-भर।
अब बस पानी की बोतलें रहती हैं-
कुछ बासी रोटियां या कुछ ब्रेड-बटर।।
याद आता है खिलाना तुम्हारा पूरियां तलकर
वो कढ़ी-राजमा, पनीर वो मखनी, आलू-मटर।
आ जाओ की कढ़ाई-पतीले बग़ावत कर रहे हैं
बंद माइक्रोवेव रोता है अपनी किस्मत पर।।
बेताब से रहते हैं तेरी याद में अक्सर
रात भर नहीं सोते हैं तेरी याद में अक्सर।।
रात भर नहीं सोते हैं तेरी याद में अक्सर।
जिस्म में दर्द का बहाना बना के,
हम टूट के रोते हैं तेरी याद में अक्सर।।
बेखयाली में रहते हैं अक्सर
दफ़्तर में देर तक बैठते हैं बेमतलब,
ज्यादा काम की दुहाई देकर।
ज़िन्दगी तो लगने लगी है बस
दफ़्तर से घर की दूरी भर।।
वो खामोश दीवाल घड़ी
जो सिर्फ समय दिखाती थी,
कानों में चीखती है वह अब
सिर्फ टिक-टिक का शोर कर।।
छत पे लटका वो पंखा
बन गया है हमदम-सखा,
घंटो उसे देखते हैं -नींद छोड़कर।
रातें अक्सरहां कटती है करवटों पर
फिर करवटें भी सो जाती हैं दम तोड़कर।।
कोने में रखा हुआ वो फ्रिज
जिसमे कई चीजें तुम रखती थी भर-भर।
अब बस पानी की बोतलें रहती हैं-
कुछ बासी रोटियां या कुछ ब्रेड-बटर।।
याद आता है खिलाना तुम्हारा पूरियां तलकर
वो कढ़ी-राजमा, पनीर वो मखनी, आलू-मटर।
आ जाओ की कढ़ाई-पतीले बग़ावत कर रहे हैं
बंद माइक्रोवेव रोता है अपनी किस्मत पर।।
बेताब से रहते हैं तेरी याद में अक्सर
रात भर नहीं सोते हैं तेरी याद में अक्सर।।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें