ये मै हूँ

ये मै हूँ
ये हम हैं..

सोमवार, 19 अगस्त 2013

फिर से उनका मिलना....

दो पल क्या मिला उनसे ,ताज़े हो गए ज़ख्म सारे
पर  दर्दे-ए-ज़ख्म की इस टीस पे, कई सुकून कूर्बान।

जंजीरों की जकड़न इधर भी थी, बेड़ियाँ उधर भी
पर रिहा होती उन निगाहों पे ,कई आजादी कुर्बान।

सफ़ेदी बालों में इधर भी थी, झुर्रियां गालों पे उधर भी
पर उम्र की उन फरियादी लकीरों पे, कई जवानी कुर्बान।

कहने को कुछ इधर भी था,दास्तान-ए-उल्फत उधर भी
पर झुकी नज़रों की उस ख़ामोशी पे ,कई फ़साने कुर्बान।

चाहत का भरम इधर भी था, कुछ ख़लिश उधर भी
पर गिला करती उस पहर पे , कई सदियाँ कुर्बान।

जाना उनका कहकर कि "फिर मिलेंगे" बिमल
इन दो लफ़्ज़ों की बख्शीश पे , कई ज़ुदाई कुर्बान।

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