ये मै हूँ

ये मै हूँ
ये हम हैं..

रविवार, 11 अगस्त 2013

इ.एम.आइ

बिक गए हैं हम,बिक गए हो तुम
 हर महीने की पहली तारीख को
आ जाती हैं किश्तें हमारी।

हाँ उस दिन पिटारी भी आती है वेतन की
पर किश्तों की सुरसा रहती है मुँह फाड़ी।

गाड़ी किश्तों पर,किश्तों पे मकान
किश्तों पे चलती है ऐयाशी सारी।

औकात न थी दो गज ज़मीं की
आसमां की हबस पड़ गई हमें भारी।

हँसी बिक गयी, बिक गए सारे आँसू
ख्वाबों की भी बोली लग गयी हमारी।

संताने भी फल रही है किश्तों की खाद से
इंजीनियर किश्तों पे, किश्तों पे डॉक्टरी

गिरवी हो गया सारा उम्मीदों का जहां
हाय ! ये किश्तें पड़ गयी सपनो पे भारी।

हुए दोस्ती-फ़साने-प्यार ख़स्ते
कौल-क़सम-क़रार सस्ते
क्या करें हम किसे संभाले
किश्तों को या रिश्तों की डोरी।

चले थे क़र्ज़ पे खुशियाँ बटोरने
ख़ुशी कैसी ! कि गई चैनों-अमन भी हमारी।

चलो तैयार हो जाएँ बिकने को
आज पहली तारीख़ है
आ गईं हैं किश्तें हमारी।


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