पिलाई थी यारों ने उस दिन क़सम पर
यादों के सागर में जा मिली चुपके से
दो घूँट ज़ाम हलक से उतरकर।
जरूर वो शराब रही थी पुरानी
तभी तो बही वो कब की कहानी
दिल से आँखों का किनारा पकड़कर।
पिलाई थी यारों ने उस दिन क़सम पर
माज़ी की तन्हाइयों में सिसकती
वो दास्तां उस दिन रोई तड़पकर।
क़रार था यारों से जो न पियेंगे ज्यादा
टूटा था छन से मैख़ाने के दर पर।
पिलाई थी यारों ने उस दिन कसम पर
# माज़ी =past
यादों के सागर में जा मिली चुपके से
दो घूँट ज़ाम हलक से उतरकर।
जरूर वो शराब रही थी पुरानी
तभी तो बही वो कब की कहानी
दिल से आँखों का किनारा पकड़कर।
पिलाई थी यारों ने उस दिन क़सम पर
माज़ी की तन्हाइयों में सिसकती
वो दास्तां उस दिन रोई तड़पकर।
क़रार था यारों से जो न पियेंगे ज्यादा
टूटा था छन से मैख़ाने के दर पर।
पिलाई थी यारों ने उस दिन कसम पर
# माज़ी =past
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